मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले पर सुनवाई की। अदालत ने दोनों को नोटिस जारी करते हुए व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे दी। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो लोग व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अदालत का रुख करते हैं, वे ही अब संस्था की आलोचना कर रहे हैं।
‘अदालत अधिकारों की रक्षा में कभी पीछे नहीं रही’
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि जब भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता या मौलिक अधिकारों पर खतरा होता है, संबंधित लोग संरक्षण के लिए अदालत आते हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में अधिकारों की रक्षा करने से कभी पीछे हटने का काम नहीं किया।
सीजेआई ने टिप्पणी की कि इसके बावजूद संस्था की निंदा और आलोचना की जा रही है, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने उम्मीद जताई कि संबंधित लोगों को सद्बुद्धि आएगी। हालांकि, ये टिप्पणियां सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से की गईं।
SCBA ने दायर की थी अवमानना याचिका
मामले में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने याचिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अवमानना की कार्यवाही शुरू करना उनके लिए दुखद है, क्योंकि संबंधित लोगों में एक जिम्मेदार सांसद और दूसरे वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मामले में उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति जरूरी होनी चाहिए।
इस पर पीठ ने दोनों को कारण बताओ नोटिस जारी करने का निर्देश दिया। अदालत ने हालांकि व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट प्रदान की। प्रदीप राय ने मामले की जल्द सुनवाई के लिए छोटी तारीख देने का अनुरोध भी किया।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने SCBA का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग अदालत पर दबाव बनाने के उद्देश्य से ऐसी टिप्पणियां करते हैं। उनके मुताबिक, ऐसी कोशिशें अदालत पर दबाव डालने के लिए हो सकती हैं, हालांकि उनका प्रभाव पड़ना जरूरी नहीं है।
अटॉर्नी जनरल ने 15 अक्टूबर को दी थी सहमति
इस मामले में भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने 15 अक्टूबर को संजय राउत और निखिल वागले के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति दी थी। यह सहमति सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका के बाद दी गई।
अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15(1)(बी) के तहत आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए अटॉर्नी जनरल की सहमति महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसके बाद SCBA की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की और दोनों को नोटिस जारी किया।
निखिल वागले ने पोस्ट हटाकर मांगी थी माफी
याचिका के मुताबिक, पत्रकार निखिल वागले ने सीजेआई के एक फैसले को लेकर अखबार में प्रकाशित खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट किया था। बाद में उन्होंने पोस्ट हटा दी और माफी मांगी।
अटॉर्नी जनरल ने अपने सहमति पत्र में वागले और राउत के बयानों को प्रथम दृष्टया गंभीर बताते हुए कहा था कि इनका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट और विशेष रूप से मुख्य न्यायाधीश की प्रतिष्ठा को कम करना प्रतीत होता है।
संजय राउत के ट्वीट पर भी उठे सवाल
अटॉर्नी जनरल के पत्र में संजय राउत के उन ट्वीट का भी उल्लेख किया गया, जिनमें भाजपा शासित राज्यों में न्यायाधीशों के राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल होने और मुख्यमंत्रियों की ओर से न्यायाधीशों के स्वागत में रात्रिभोज आयोजित करने संबंधी दावे किए गए थे।
पत्र के अनुसार, इन दावों के समर्थन में तथ्य नहीं थे और ट्वीट के दूसरे हिस्से में किए गए दावों की भी पुष्टि नहीं की गई थी। अटॉर्नी जनरल ने बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया की याचिका से जुड़े दिल्ली हाईकोर्ट के 19 जून 2026 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि न्यायाधीशों के लंदन में बैडमिंटन खेलने और भाजपा से जुड़े लोगों के साथ होने संबंधी दावे गलत पाए गए थे।
उन्होंने कहा कि सांसद को ऐसे आरोप लगाने से पहले तथ्यों की पुष्टि करनी चाहिए थी।
अब जवाब के आधार पर आगे बढ़ेगी कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद संजय राउत और निखिल वागले को अदालत के सामने अपना पक्ष रखना होगा। फिलहाल अदालत ने केवल कारण बताओ नोटिस जारी किया है। आगे की कार्रवाई दोनों के जवाब और मामले में अदालत के विचार के आधार पर तय होगी।
यह मामला न्यायपालिका की प्रतिष्ठा, सार्वजनिक आलोचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़ा है। अदालत में आगे होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि अवमानना याचिका पर क्या रुख अपनाया जाता है।

